राष्ट्रीय नीति दस्त्तावाजों में मुल्यांकन

मुदलियार  आयोग

भारत  में शिक्षा पर गणित मुदलियार आयोग (१९५२ -५३ ) ने अनेक महत्वपूर्ण अभिशंसाए दी थीं . आयोग ने शेक्षिक मूल्यांकन ऑर परीक्षाओं पर भी विचार किया था . इस संदर्भ में इसकी सिफारिशें एक तरह से प्रस्थान बिन्दु हैं क्योंकि हम इन्हें आगे भी बच्चों के आकलन संबंधी विमर्श में किसी न किसी रूप में विकसित होते या दोहराए जाते देखते हैं .

मुलियार आयोग आंतरिक ऑर बाह्य दोनों तरह की परिषाओं पर विचार करता है . इसमें स्कूल के अन्दर सत्र परिषाओं की बात भी की गई है . लेकिन सुझाया गया है की बाह्य  परीक्षा स्कूल पढाई के आखरी चरण में ही आयोजित की जनि चाहिए . सार्वजानिक परीक्षा के महत्व को स्वीकारते हुए आयोग कहता है की हमारी शिक्षा प्रणाली बुरी तरह से परीक्षा आक्रंत है .

सार्वजानिक परीशा की सीमाओं को चिंहित करते हुए मुदलियार आयोग मानता है की यह बच्चे के विकास के सभी पह्लुओं को नहीं समेटती . आयोग रेंखांकित करता है की बीसवीं शताब्दी में शिक्षा का अर्थ ऑर स्म्भावनाए बहुत विस्तृत हो गए है . इएसे में परीक्षा के वास्तविक मूल्य को स्थापित करने के लिए इसमें गुणात्मक बदलाव करने की आवश्यकता है . अओय्ग इस संदर्भ में ‘परीक्षाओं की परीक्षा ‘पर हर्टोंग रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहता है की परीक्षा तो ठीक से बच्चे के बोव्धिक विकास का भी आकलन नहीं कर पति . आयोग ने परीक्षा से सकूल  की स्बंधता पर बहुत ओर दिया है . साथ ही परीक्षाओं के नोट्स ऑर कुंजी आधारित होने पर गंभीर चिंता जताई है .

मुदलियार आयोग का मानना है की परीक्षाओं में जोर दिखने ऑर मापी जा सकने वाली बौद्धिक क्षमताओं पर होता है . जबकि बेहतर शिक्षा बच्चे के बौद्धिक , सामाजिक ऑर सर्वाग विकास में मददगार होती है . इसमें शिक्षक के दीर्घकालीन ऑर बहु – आयामी प्रयास  शामिल होते है , जिन्हें परीक्षा नहीं समेट पति . आयोग परीक्षा परिणाम पर आधारित स्कूल की सफलता की तुलना किसी ओद्योगिक घरे के लाभ – हनी के खाते के करने हुए इसकी गुणवता पर प्रश्न-चिन्ह लगाता है . परीक्षा ने पाठ्यचर्या से चुनाव करने की एक ऐसी संकीर्ण दुर्ष्टि बच्चों ऑर शिक्षकों में विकसित /की है जिसने शिक्षा का अवमूल्यन किया है . इससे ओसत छात्रों की संखिया बढ़ी है . संभवत : मुदलियार आयोग ने पहली बार बच्चों के स्वतंत्र अध्यतन के स्थान पर उन्हें तथ्य रटने ( स्पून फीड ) जैसी प्रवृति की पहचान कर उसे चिंता के केन्द्र में रखा .

मुदलियार अओय्ग प्रस्तावित करता है की कई बाह्य पर्क्षाओं  के स्थान पर माध्यमिक शिक्षा में सिर्फ एक पर्क्ष होनी चाहिए . आयोग  निबंधात्मक प्रश्नों को कम करके  वस्तुपरक प्रश्नों को बढ़ाने का प्रस्ताव करता है . आयोग समझ ऑर चिंतन को अभिव्यक्त करने वाले प्रश्नों पर जोर देता है . स्कूली शिक्षा में आंतरिक परीक्षणों की अहमियत प्रतिपादित करते हुए आयोग ने बच्चे के प्रगति प्रतिवेदन को महता प्रदान की है .इस प्रतिवेदन में बच्चे की रुचियों , दूष्टिकोण ,वैयक्तिक प्रवृति ऑर उसके समाजिक रुज़नो का क्रमिक लेखा जोखा हो चाहिए . आयोग बच्चे  के मुलियांकन ऑर परीक्षा दोनों में शिक्षक की महती भूमिका मानते हुए उस पर भरोसा रखने की सिफारिश करता है. साथ ही बच्चे का अंक प्रतिशत देने के स्थान पर रिपोर्ट में प्रस्तावित ‘ए’ ,’ बी ‘ , ‘सी ‘, डी, व’,इ ‘पांच स्केल पर अंकन की सिफारिस करता है . उस समय आयोग ने बच्चे को’ फेल ‘करार देने के स्थान पर ‘ फिर से उसी कक्षा में भेजने जैसी किसी शब्दावली को अपनाने की बात की थी . इसमें तीन पूरक परीक्षाओं की गई है . नोर्वुड कमिटी रिपोर्ट (१९४१ , पृ.३२ ) का संदर्भ देते हुए स्कुल प्रमाण – पत्र को भी एक प्रमाणिक दस्तावेज मानने की सिफसिश की गई है .

कोठारी आयोग

कोठारी आयोग (१९६४ -६६ ) मूल्यांकन के नए कार्यक्रम की शुरुआत में ही कहता है , ‘भारत में परीक्षा की बुराइयाजगजाहिर हैं ‘. वैसे देश में राष्ट्रीय स्तर पर बने शिक्षा आयोगों ऑर समितियों में कोठारी आयोग की खास प्रतिष्ठा है . इस रिपोर्ट में आयोग ने शेक्षिक मूल्यांकन ऑर परीक्षा को शिक्षण प्र्क्रिया के अन्य उपागमो की संगति में देखा है . उनके अनुसार मूल्यांकन शिक्षा के उदेश्यों से निर्धारित होना चाहिए . यही नहीं इसे शिक्षण – विधियों की निरंतरता में देखा गया है . आयोग ने अपनी रिपोर्ट में मूल्यांकन से पहले वाले हिस्से में शिक्षण पद्धतियों ऑर शैक्षणिक मार्गदर्शन पर विस्तृत चर्चा की है .

शिक्षा परिदृश्य में आयोग क्रांतिकारी बदलाव को लक्षित करता है . प्रारंभिक शिक्षा को इसलिए अहम माना गया है की यह बच्चे के शरीर, मस्तिष्क ऑर आत्मा की अन्तर्निहित शक्तियों को आकर देती है . आयोग के समय तक शहरी स्कूलों के शिक्षण में दृश्य –श्रव्य सामग्री का उपियोग होने लगा था ऑर दिल्ली के कुछ स्कूलों में कम्पयूटर का भी इस्तेमाल हो रहा था . लेकिन ग्रामीण स्कूलों की दुरवस्था से आयोग अनभिज्ञ नहीं था , जहां पढाई सिर्फ मौखिक निर्देशों पर आधारित थी . इस समय तक हिन्दी देवनागरी लिपि मानक स्वरूप नहीं ले पाई थी . ऐसे में आयोग का यह स्वीकार करना स्वभाविक ही था की शिक्षा को पहल , सृजनात्मक ऑर प्रयोगों को प्रोत्साहित करने के लिहाज से नियोजित नहीं किया गया है .

कोठारी आयोग शेक्षणिक जड़ता स्थिति के विरुद्ध लिचिलेपन ऑर गतिशीलता की वकालत करना है .आयोग शिक्षा की बुनियाद इकाईयों – शिक्षार्थी , शिक्षक ऑर स्कुल को स्वायतता दिए जाने का समर्थक है . आयोग का शेक्षणिक नवाचार ऑर प्रयोगों पर बहुत जोर है . इनके केंद्र में शिक्षक की भूमिका को देखा गया है . आयोग दृढ़ता से कहता है कि हमें खतरा उठाकर भी शिक्षक में विशवास रखना होगा (पाठ्यचर्या, पाठ्यपुस्तकों ऑर स्कुल की अकादमिक गतिविधियों में शिक्षक ऑर शिक्षक समूह के लिए आयोग ने अनेक संभावनाए खोली हैं .

इसी क्रममें मूल्यांकनपर विचार करते हुए इसे नए नजरिए से देखने की बात कही गई है . उस समय तक राष्ट्रियशेक्षणिक अनुसंधान व् प्रशिक्षण परिषद्(एन . सी .ई.आर. टी.) ऑर राष्ट्रिय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सी .बी .एस .ई.)अस्तित्व में आ चुके थे . राज्यों में भी ऐसी संस्थाएं खड़ी हो रही थीं १९५८ में भारत सरकार द्वारा केन्द्रीय परीक्षा इकाई की स्थापना की थी . आयोग इन सभी कार्यवाहियों को देश में चल रहे शेक्षिक आन्दोलन के रूप में देखता है . आयोग द्वारा मूल्यांकन को एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखा गया है जो की शिक्षा की समग्र प्रणाली का अविभाज्य हिस्सा है उदेश्यों से संबध्दहै इसका बच्चे की सीखने की प्रवृतियों ऑर शिक्षक की सिखाने की पद्धतियों से सीधा संबंध है .

आयोग मूल्यांकन की वैधता , प्रमाणिकता , वस्तुपरकता ऑर व्यवहारिकता को अनिवार्य मानता है . आयोग परीक्षा की सबसे बड़ी कमी इसके लिखित स्वरूप को देखता है ऑर अवलोकन , मोखिक परिषणतथा व्यवहारिकता अभियासों को इसके साथ जोड़ने की अभिशंसा करता है .आयोग के अनुसार परीक्षा के पुरे चरित्र को बदलने की जरूरत है इसने उम्मीद जाहिर की है तीसरी पंचवर्षीय योजना तक हर राज्य का अपना परीक्षा बोर्ड गठित हो जाएगा .उल्लेखनीय है की कोठरी आयोग परीक्षा के संदर्भमें विकेंद्रीकरण ऑर स्वायत्तता के सिद्धांतों को ही अपनी सिफारिशों का आधार बनता है .

आरंभिक स्तर पर मूल्यांकन की चर्चा करते हुए कोठरी आयोग ने उस समय बच्चे की सिखने की अपनी गीति को लक्षित करते हुए उसके प्रति संवेदनशीलता बरतने की बात की थी . आयोग ने शिक्षक के अवलोकनों को महत्वपूर्ण मानते हुए बच्चे के प्रगति का समग्र विवरण रखने पर जोर दिया . कोठरी आयोग भी प्रारंभिक शिक्षा के अंत में सिर्फ एक बाह्य परीक्षा की बात करता है .इससे पूर्व के आकलनोंको आयोग द्वारा शेक्षणिक सर्वेक्षण कहा गया है .मूल्यांकन ऑर परीक्षा को जिला स्तर तक विकेन्द्रित करते हुए आयोग ऐसी आथोरिटी के गठन का प्रस्ताव करता है . परीक्षा सुधार के संदर्भ में आयोग इन्हें कम ऑपचारिक बनाने ,बच्चे के लिए सहज ऑर समाज के लिए अधिक वैध बनाने का प्रस्ताव करता है .मूल्याकन या परीक्षा बच्चे के ज्ञान का पता ही न करे बल्कि ज्ञान के प्रयोग करने की क्षमता ऑर इसकी पकृति का भी आकलन करे .

आयोग ने पिछले पांच वर्षों की परीक्षा परिणाम का विश्लेषण कर पाया था की 55 प्रतिशत बच्चे प्रारंभिक ऑर 70 प्रतिशत बच्चे माध्यमिक शिक्षा में असफल रहे थे . आयोग ने माना की ऐसी असफलता बच्चों में हिन् भावना उत्पन्न करती है .इसे देखते हुए परीक्षा के तरीके व् अंकन को अधिक संवेदनशील बनाने की अनुशंसा करते हुए पिमान में उतीर्ण –अनुतीर्ण की टीप्पणी को प्रयुक्त न करने की सलाह दी थी . आयोग ने स्कुल द्वारा प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने पर जरी किए जाने वाले प्रमाण – पत्र को पर्याप्त अहमियत दिएजाने की अनुशंसा की .साथ ही मूल्यांकन व् परीक्षा में नए प्रयोगों ऑर अनुसंधानों के लिए प्रस्ताव किया .

यह विडम्बना जैसा ही लगता है की कोठरी आयोग की कार्यवाही रिपोर्ट की तरह बनी नई शिक्षा नीति , १९६८ में परीक्षा पर एक संक्षित अनुछेद है . इसमें कहा गया है की परीक्षा सुध्हर का मूल लक्ष्य इसकी विशवसनीयता ऑर वैधता में सुधार करना होगा . मूल्यांकन को एक सतत प्रक्रिया मानते हुए इसे बच्चे की उपलब्धि का ‘प्रणाम ‘ बनाने की जगह इसकी उपलब्धि में गुणात्मक सुधार लेन के लिए प्रयुक्त किया जायेगा .

राष्ट्रिय पाठ्यचर्या रुपरेखा १९९५

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रुपरेखा, १९७५ में भी कोठरी आयोग की स्थापनाओं को ही दोहराया गया है . मसलन मूल्यांकन का प्रमुख लक्ष्य यह देखना है की पाठ्यचर्याके निर्धारित उदेश्योंकी किस सीमा तक प्राप्ति हुई है . यह प्रक्रिया स्वभावतः शेक्षिक अनुभवों ऑर शिक्षा की उन विधियों से संबद्ध है जो सिखने की प्रक्रिया में प्रयुक्त की गई हों . मूल्यांकन को निश्चित उदेश्यों की प्रप्ति के लिए विशवसनीय ऑर ठोस प्रमाण देने वाला होना चाहिए . यह लिखित प्रायोगिक ऑर मौखिक परीक्षाओं , निरिक्षण ,स्तरीकरण इत्यादित विभिन्न साधनों ऑर तरीकों से होना चाहिए ताकि विभिन्न उदेशियों ऑर वास्तु सामग्री से संबद्ध पुल्बधि का मूल्यांकन हो सके . दस्तावेज़ कहता है की मूल्यांकन शिक्षक को सव्यंकरना चाहिए . मूल्यांकन का तरीका एसा होना चाहिए की विद्याथी कंठस्थ करने की प्रवृति न अपनाएंऑर अपने ज्ञान का उपयोग नई स्थितियों ऑर समस्याओं के समाधान ढूंढने में कर सकें .

इस दस्तावेज की सबसे उल्लेखनीय बात मूल्यांकन प्रक्रिया को समुदाय के बिच ले जाने की है . इसमें प्रत्येक स्कुल दवरा समुदाय में एसी सभाएं करने का प्रस्ताव किया गया है जिसमें समुदाय को बताया जाए की मूल्यांकन किस प्रकार किया जाता है व् विद्यार्थी की शिक्षा ऑर विकास में प्रगति लेन ऑर शिक्षकों द्वारा शिक्षण में सुधार लाने में किसी प्रकार उसका उपयोग किया जाता है .

मूल्यांकन ऑर परीक्षा सुधार पर एक उत्तरवर्ती दस्तावेज (एन . सी . ई. आर .टी .१९८८ )नई सिक्षा नीति में प्रस्तावित न्यूनतम अधिगम स्तरों ऑर इनके मूल्यांकन पर विस्तार से चर्चा करता है . इसमें कोठरी आयोग द्वारा प्रारंभिक ( आठवीं कक्षा तक ), माध्यमिक (१०वीं कक्षा तक ) ऑर उच्च माद्यमिक (१२ वीं कक्षा तक ) के स्तर निधारण से सहमती जताते हुए इन तीनों स्र्त्रों के लिए अलग –अलग न्यूनतम अधिगम स्तर निधारित करने की बात कही गई है . इनके सतत एवं समग्र आंतरिक मूल्यांकन का प्रस्ताव किया गया है . इस दस्तावेज में परीक्षा का उदेश्य बच्चे की श्रेणी का निर्धारण करना है नई सिक्षा नीति (१९८६ ) में दक्षता आधारित न्यूनतम अधिगम स्तरों के लिए दिशा – निर्देश जरी करने का कम राष्ट्रीय ( सी . बी . एस . ई. – एन .सी . ई. आर .टी .) तथा जिला (डाईट) स्तर पर निर्धारित कर दिया था . मूल्यांकन प्रक्रिया भी इन्हीं से स्बंद्ध थी .

परीक्षा को लेकर दस्तावेज सुझाता है की इससे अतलबाजी ऑर व्यक्तिपरकता को कम किया जाए , स्मुति पर निर्भरता को समाप्त किया जाए . परीक्षा को विषय आधारित संकीर्णता से बच्चे की समझ ऑर दृष्टि तक विस्तृत करने की बात कही गई है . परीक्षा के प्रबंधकीय पहलुओं की स्थिति पर चिंता जताते हुए ‘ खुली ‘ पुस्तक से परीक्षा की ऑर बढ़ने का रास्ता प्रस्तावित किया गया है .  

यशपाल समिति रिपोर्ट

भारत में शिक्षा की परीक्षा प्रणाली पर सबसे तीखी आलोचना यशपाल समिति (१९९२ – ९३ ) की रिपोर्ट है इससे पहले ९८६ की राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू हो चुकी थी जिसने न्यूनतम अधिगम स्तर पर आधारित शिक्षण प्रक्रिया को देश भर में विस्तारित कर दिया था .१९९० तक  एनसीईआरटी  दक्षता आधारित न्यूनतम अधिगम स्तरों को लेकर पाठ्यपुस्तकों का निर्माण कर चुकी थीं . स्कूली स्तर पर इन्हें सतत एवं समग्र मूल्यांकन प्रक्रिया से जोड़ा जा चूका था . १९९२ में राज्यों के परीक्षा बोडों ने नविन से बारहवीं तक के लिए न्यूनतम अधिगम स्तर पर आधारित परीक्षाओं का खाका तैयार कर लिया था .

यशपाल समिति परीक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी कमी के रूप में इसकी सुचना व् तथ्य निर्भरता को पाती है . यह बच्चे की सुचना व् तथ्य के पुनरुत्पादन की क्षमता का आकलन करती है , न कि बच्चे द्वारा इन सूचनाओं ऑर तथियों को किन्हीं नई स्थितियों में प्रयुक्त करने की क्षमताओं का परिक्षण . रिपोर्ट के अनुसार परीक्षाएं ऐसावातावरण निर्मित के देती हैं जिसमें बच्चे , अभिभावक ऑर शिक्षक आतंकित रहते हैं . चूंकि दसवीं ऑर बारहवीं की परीक्षा में प्राप्त श्रेणियां ऑर प्रतिशत बच्चे के कैरियरको प्रभावित करते हैं इसलिए परीक्षाओं के इर्द –गिर्द मुनाफे आधारित कारोबार पनप गए है . पाठ्यपुस्तकों के साथ कुंजियों ऑर गाइडों का कारोबार ऐसा ही उधम है . ऐसी स्थिति में , यशपाल समिति परीक्षा में संरचनागत ऑर प्रक्रियात्मक बदलाव प्रस्तावित करती है .

बस्ते के बोझ का सह- संबध  समिति परीक्षा के साथ देखती है . पाठ्यपुस्तकों की सख्त समीक्षा करते हुए समिति इन्हें सूचनाओं ऑर तथ्यों का नीरस संकलन पाती है . बच्चों को इन्हें परीक्षाओं के लिए अपने मस्तिक में ठूंसना पड़ता है  रो वहन कागज पर उतरना होता है . समिति इसे दिमाग में ठुसने की बात इसलिए कहती है की बच्चाइन सूचनाओं ऑर ठियों का वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं देख पातीहै . ग्रामीण ऑर शहरी गरीब बच्चों के संदर्भ में तो यह स्थिति ऑर भी यात्नादायी हो जाती है . समिति ने पाया की पाठ्यपुस्तकों में आई सूचनाओं ऑर तथ्यों के संदर्भ शहरी मध्यमवर्ग से संबधित हैं .गर्मीं व् शहरी गरीब बच्चा तो इन चीजों को संभवित बताती है जबकि पाठ्यपुस्तकों में घरेलू उपकरणों का उल्लेख होते हुए भी कहीं झाड़ू को शामिल नहीं किया गया है . शायद इसे एक हीन  प्रतीक माना गया है .

प्रश्न पत्र की संरचना ऑर इसके पीछे की तार्किकता के संबंध में समिति एक उदाहरण प्रस्तुत करती है . सड़क भी एक खेल का मदन है ‘ इस वाक्य को परिक्षण की दृष्टी से गलत माना जाएगा क्योकि बच्चों के लिए ‘सड़क पर खेलना जोखिम भरा है . जबकि यह सच्चाई है की देश में लाखों बच्चे सड़क ऑर गलियों में खेलते है . परीक्षा सुधार के संबध में यशपाल समिति की एकमात्र अनुशंसा है की इसे पाठ्यपुस्तक आधारी ऑर पहलिनुमा न होकर अवधारणा आधारित होना  चाहिए .

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रुपरेखा 2000    

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रुपरेखा , 2000  में शिक्षा के उदेश्य को कुछ संकुचन परिलक्षित होता है . मूल्यांकन को भी उदेश्यों के साथ जोड़कर देखा गया है. की ‘वह  शिक्षार्थी को एक जिम्मेदारी ऑर उत्पादक नागरिक की तरह विकसित होने के काबिल बनाए जोर  उसका शिक्षार्थी समूहों को विशिष्ट स्थितियों एवं आवश्यकताओं के अनुसार अनुकूलन किया जा सके . तत्कालीन मूल्यांकन प्रणालियों की अपूर्णताओं को चर्चा करते हुए कहा गया है कि  – संज्ञानात्मकआयामों को पूरी तरह से नजरंदाज या उपेक्षित कर देती है . ….यहां तक किसं संज्ञानात्मक क्षेत्रों में भी रटकर याद कर लेने पर तो उसका बहुत जोर रहता है मगर उन योग्यताओं ऑर कौक्षालों पर बहुत कण धियं रहता है जो उच्च मानसिक क्रियाओं , जैसे समस्या निवारण , सर्जनात्मक सोच , सारांश बोध, निष्कर्ष , तर्क – वितर्क के लिए आवश्यक है ,.

दस्तावेज में परीक्षाओं की आलोचना को भी दोहराया गया है की ये तो लिखित जाँच का ही उपयोग करती है . ये बहुविधि मूल्यांकन तकनीकों के प्रयोग के अवसर नहीं देती हैं , जैसे – मौखिक , तकनीक , अवलोकन , प्रोजेक्ट , असाइनमेंट आदि . दस्तावेज कार्य योजना ( पि . ओ . ए . ) १९९२ को उद्धत करता है , बाह्य पर्क्षाओं के प्रभाव को कम करना चाहिए . पर्क्ष में असफल होने पर बच्चों द्वारा आत्महत्या करने को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है .

संक्षेप में एनसीएफ 2000 का प्रस्ताव बच्चों की तुलनीय योग्यता के महत्व को स्वयं विद्यार्थी के संदर्भ में , शिक्षक द्वारा निधारित कसौटी के संदर्भ में ऑर अपने ही साथी विद्यार्थियों के बिच योग्यता के मूल्यांकन के संदर्भ में रेखांकित करता है . विषय पर प्रवीणता प्राप्त कराने वाली शिक्षण पद्धति पर कमजोर छात्रों के लिए निदानात्मक ऑर उपचारात्मक शिक्षण ऑर कुशाग्र छात्रों के ज्ञान संवर्धन के लिए शिक्षण युक्तियों पर जोर देता है . विधालियी शिक्षा के विभिन्न स्तरों के लिए विभिन्न पाईटो में ग्रेड प्रणाली के प्रयोग का प्रतिपादन करता है . सतत ऑर व्यापक मूल्याकन करने , उसका रिकोर्ड रखने ऑर उस पर आधारित रिपोर्ट कार्ड बनाने का प्रस्ताव करता है . माध्यमिक स्तर पर सेमेस्टर प्रणाली का पक्षधर है . आखरी में  राष्टीय शिक्षा नीति (१९८६) ऑर कार्य योजना (१९९२) द्वरा प्रस्तावित राष्ट्रीय मूल्यांकन संगठन का समर्थन करता है .

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रुपरेखा २००५

राष्ट्रिय पाठ्यचर्या रुपरेखा , २००५ (एनसीएफ) के आने तक दक्षता आधारित न्यूनतम अधिगम स्तर की शेक्षणिकऑर मूल्यांकन केन्द्रिय सीमाएं देश भर में उजागर हो चुकी थीं .स्वभाविक ही था की एनसीएफ २००५ इसकी वस्तुपुरक आलोचना प्रस्तुत करता. यहां इस आलोचना का उल्लेखन इसलिए भी जरुरी है क्योंकि मूल्यांकन ऑर परीक्षा भी इस योजना से संचालित थे . एनसीएफ २००५ में कहा गया है कि न्यूनतम अधिगम स्तरजैसी योजनाओं ने ना केवल साल के अंत में आने वाले नतीजों के सख्त पालन पर जोर दिया बल्कि नतीजों को पाठ आधारित करके ऑर संकीर्ण बना दिया . दक्षताओं को लेकर कहा गया की ये शिक्षण ऑर उससे संबंधित आकलन का ध्यान पाठ्यपुस्तक एवं तथ्ययुक्त विषयवस्तु से दूर ले जाने का एक प्रयास है परन्तु अधिगम के न्यूनतम स्तरके उपागम में दक्षताओं को विस्त्तृत उप – दक्षताओं ऑर उप – कौशलों में तोडा गया है ., यह मानकर की इसका कुल योग दक्षता है. परन्तु अक्सर व्यव्हार ऑर प्रस्तुति पर दयां देने से अवधारणओं के लिए तो यह जगह ही नहीं बचती .  उप – कौशलों  के इस तार्किक , लेकिन यांत्रिक सूचीकरण से ऑर उनकी उपलब्धि के लिए बनाई गई सख्त समय – सरणी से , कहीं भी यह नहीं झलकता है की जिस चक्र में दक्षताएं सीखी जाती है  जरुरी नहीं है की वे निर्धारित समय ऑर , गति के अनुसार ही सीखी जाएगी . यह सरकार भी कहीं प्र्तिबिम्भित नहीं होता की समग्र , दरअसल विभिन्नभागों के जोड़ से ज्यादा भी हो सकता है . इस विस्तृत सूचि के लिए अधिगम ऑर परिक्षण के विषयों की सूचि बनाना ऑर पूर्व – निर्धारित अधिगम के परिणामों के लिए पढना बिक्लुल ही अव्यवहारिक है ऑर शिक्षाशास्त्रिय नजर से अविश्वसनीय भी है .

 शिक्षार्थियों के आकलन के संदर्भ में एनसीएफ २००५ कहता है की पाठ्यपुस्तक आधारित अधिगम ऑर रटे हुए वाक्यों को जांचने वाले पैक्षण , दोनों ही बेकार हैं . दस्तावेज स्वीकार करता है की पाठ्यचर्या के सभी विषय परीक्षा द्वारा नहीं जांचे जा सकते . यह भी कि अंक बिना दिए भी बच्चों का इन क्षेत्रों में विकास के लिए आकलन किया जा सकता है . भागीदारी , रूचि पोर जुड़ाव तथा जिस स्तर तक क्षमताओं एवं कौक्षालों का विकास हुआ , ये कुछ सूचक हैं जिनके आधार पर शिक्षक यह समझ बना सकते हैं की बच्चों की किन्हीं गतिविधियों से कितना फायदा हुआ है बच्चों को खुद बताने के लिए कहा जाए तो उससे भी मूल्यांकन के लिए एक अंतदृष्टि विकसीत होगी .

 एनसीएफ २००५ की सिफारिश है कि आकलन ऑर पर्क्षाओं को विश्वसनीय होना चाहिए एवं अधिगम को मापने के वैध तरीकों पर आधारित होना चाहिए . इसके अनुसार अच्छे प्रश्न ऑर परीक्षा – पत्र बनाना भी एक कला है ऑर शिक्षकों को ऐसे प्रश्न बनाने पर बल देने की जरूरत है . साथ में , खुली पुस्तक परीक्षा – पत्र बनाना भी एक चुनौती है जिसे स्कुल प्रत्येक स्तर के पाठ्यचर्या प्रयासों में शामिल करना चाची . अंक ऑर स्पर्धा मुल्यान्कम का कक्षा की संस्कृति पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि बच्चे व्यक्तिवादी बनते हैं ऑर सामूहिक कार्य करने की क्षमता खो बैठते हैं  परीक्षा को बिलकुल असंगत महत्व दिया जाता है ऑर उन पर आवश्यक ध्यान केन्द्रित किया जाता है जिसमें अक्सर गोपनीयता ऑर निरिक्षण की सख्त व्यवस्था की जाती है . एनसीएफ २००५ में सतत व् समावेशी मूल्यांकन को ही एक सार्थक मूल्यांकन माना गया है .

एनसीएफ २००५ के समानान्तर ही परीक्षा प्रणाली में सुधार पर राष्ट्रिय फोकस समूह का आधार पत्र जरी किया गया था . इसकी अनुशंसाओं को ही बाद में सीबीएसई  बोर्ड द्वारा लागू किया गया . इसकी कुछ सिफारिशों शिक्षा का अधिकार कानून २००९ में शामिल की गई जिनमें आठवीं कक्षा तक किसी बच्चे को फेल नहीं करना ऑर परीक्षा के स्थान पर सतत एवं समग्र मूल्यांकन का प्रवधान हसी . दशवीं बोर्ड परीक्षा को ऐच्छिक करने ऑर परिणाम को ग्रेड आधारित करने जैसी बातें भी इस आधार – पत्र से ही ली गई है . इनमे परीक्षा व् मूल्यांकन को शिक्षा के अन्य उपागमों की संगती में देखा गया है .

 आधार – पत्र प्रस्ताव करता है की आकलन के विविध प्रकारों का उपयोग किया जाना चाहिए जिसमें मौखिक परिक्षण एवं सामूहिक कार्य मूल्यांकन भी शामिल होने चाहिए . प्र्तियेक व्यक्ति से प्रत्येक विषय की पूरी जानकारी की अपेक्षा उहित नहीं है ओए यह कहना है कि शिक्षा में योग्यता एक सापेक्षिक विचार नहीं है .

आधार पत्र की मान्यता है की परीक्षाएं , तंत्र की सुविधा के लिए निर्मित कृत्रिम परिस्थितियां हैं , न की व्यक्तिगत शिक्षार्थी के लिए . ‘ हम इस चिंता को स्वंय रोग के रूप के बजाय, परीक्षाओं से पीड़ित रुणता के चिन्ह के रूप में देखते हैं ‘ . ऐसा मानते हुए समूह ने यशपाल समिति की एक धारणा को उद्धत किया है इसमें यह मानते हुए की शिक्षा पशिर्व्क बांध बनती है, कहा गया है , ‘ मस्तिक में ज्ञान की परिस्थिति की रचना करती है तो ऐसे प्रश्न निश्चित रूप से आवश्यक हैं जो अव्धार्नाओं पर आधारित हों . आधार पत्र ‘ अनुतीर्ण ‘ शब्द बांध के पूरी तरह निष्कासन की अनुशंसा करता है परीक्षाएं बुरे है इस सिधांत को मानते हुए कहा गया है की ‘ जहा अतिय्न्त आवश्यक न हो वहां कोई परीक्षा नहीं होनी चाहिए . दश्विन्कक्षा की बोर्ड परीक्षाएं तुरंत ऐच्छिक बना देनी चाहिए  .

आधार पत्र कहता है की शिक्षकों के पुन : सक्शितिकरण व् बोर्ड के नि : शक्तिकरण के प्रयास होने चाहिए , न कि शिक्षा प्रणाली में आए बोर्डों की शक्ति के विस्तार के. समूह बच्चे के परिवेश को उसकी उपलब्धि के सह – संबंध में देखता है . काहा गया है , क्या हम ईमानदारी पूर्वक कह सकते हैं की दो विद्यार्थी , जिन्होंने ७५ प्रतिशत अंक प्राप्त किए हैं , लेकिन एक विद्यार्थी दक्षिण मुम्बई के एक स्कुल में पढ़ा है ऑर दूसरा ग्रामीण क्षेत्र के एक स्कूल में , समान योग्यता वाले हैं ? क्या ग्रामीण विद्यार्थी को व्यवस्थागत बड़ी विषमताओं को नहीं पार करना पड़ा होगा ?

समूह दृढ़तापूर्वक महसूस करता है की (क) बच्चों पर से दबाव कम करने (ख ) मूल्यांकन को व्यापक ऑर नियमित बनाने (ग ) शिक्षकों को रचनात्मक शिक्षण का अवसर देने (घ) निदान के लिए साधन उपलब्ध करने ऑर श्रेष्टतर योग्यता वाले विद्यार्थीयों को तैयार करने के लिए स्कुल आधारित सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (सीसीई ) व्यवस्था स्थापित हो . समूह का मनाना है की मूल्यांकन को कम दोषपूर्ण बनाया जाए . भारत में बोर्ड परीक्षाओं के पुनर्परीक्षण की गंभीर जरुरत है. भारतीय शिक्षा व्यवस्था में पूंछ (मूल्यांकन ) ने कुते (अधिगम ऑर अध्यापन ) को हिलाया है न की कुते ने पूंछ को .

राष्ट्रीय फोकस समूह के आधार पत्र को जरी हुए भी एक दशक होने जा रहा है . इस दौरान शिक्षा के अधिकार अधिनियम की क्रियान्विति को अर्द्ध दशक हो रहा है . आठवीं तक बच्चों का अनुतीर्ण न करने ने स्कूली शिक्षा में भयानक अराजकता की स्थिति उत्पन्न कर दी है क्योंकि सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की किसी प्रणाली में स्कूलों में प्रभावी जगह नहीं बनाई है . ग्रेड देंर ऑर बोर परीक्षा को ऐच्छिक करने पर मिडिया में बहस शुरू हो गई है . राष्टीय ऑर राज्यों के स्तर पर परीक्षा अभी भी यक्ष प्रश्न बनकर खड़ी हैं जिसका कोई सर्व सवीकृत ऑर सार्थक समाधान कहीं दिखता नजर नहीं आ रहा . शिक्षा पर राष्ट्रीय दस्तावेज भी एक ही केंद्र में घूर्णन करते प्रतीति होते हैं .

१. मुदालियार समिति रिपोर्ट १९५२-५३

२. कोठारी आयोग रिपोर्ट , १९६४ – ६६

3 . राष्ट्रीय शिक्षा नीति , १९६८

४ . राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रुपरेखा ,  १९७५

5 . एनसीईएसई , १९८८

६. यशपाल समिति रिपोर्ट , १९९२ – ९३

७. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रुपरेखा , २०००

८.राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रुपरेखा , २००५

९. परीक्षा प्रणाली में सुधार पर राष्ट्रीय फोकस समूह का आधार पत्र , २००५

(राजाराम भादू जी के लेख से )

2 thoughts on “राष्ट्रीय नीति दस्त्तावाजों में मुल्यांकन

  1. erjilopterin says:

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