The Invisible Barriers to India’s Educational Reforms Suzana Brinkmann के लेख पर से लिए गए कुछ बिन्दु

                            

                          

कुछ सवाल से   शुरुआत करते हैं , जो अक्सर हम सभी ने उठाए हैं ,अपने –अपने स्तर पर जबाब भी तलाशने के प्रयास किये हैं .

सरकारी शिक्षक जो की नौकरी की बुनियादी अहर्ता पूरी करते हैं –फिर हमें सरकारी स्कूलों  में वांछित परिणाम देखने को क्यूँ नहीं मिलते है ?

वो क्या बाधाएँ हैं जो आसानी से दिखायी भी नहीं दे रहीं है , जबकि ३ दशक हो गए हैं इस मुहीम को चलाये – “बाल केन्द्रित शिक्षा “-राष्ट्रिय दस्तावेज तो यही बात कर रहे हैं .

यह लेख इन्ही सावालों को बुनता है , फिर खोलने का प्रयास करते हुए जबाब तलाशता है , सभी भारतीय शिक्षाविद इस बात पर सहमति दर्शाते हैं की – सोचने की खास संस्कृति ,शैक्षिक बदलावों के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है . शोध से पता चलता है की –अपने आस पास की दुनिया को देखने –समझने  के तीन केद्रीय विचार जो सरकारी शिक्षकों  व् राष्ट्रिय निति .दस्तावेजो –आपस में धुर विरोधी है ,यही वो मुख्य कारक हैं  जिनकी वजह से जिन बदलावों  को संविधान /नितिगत दस्तावेज सिखने –सिखाने की प्रक्रिया में लाना चाहते हैं ,नहीं आ पा रहे हैं , ये हैं-

1. समानता व् असमानता को लेकर मान्यता

२. ज्ञान आदान –प्रदान के तरीके व्  वैचारिक उदारता

३. व्यग्तिगत आगे बढ़ने के उद्देश्य व् भाईचारा

तीन दशक से ज्यादा से भारत ये सपना संजोय है – बाल –केन्द्रित समावेशी शिक्षा प्रत्येक बच्चे के लिए , पर सपना पूरा होने का नाम ही नहीं ले रहा है .

जाने क्यूँ ? जब ये विज़न सरकार की नीतियों में है , पाठ्यचर्या में है , सरकारी योजनाओं में है और हमारे क्षमता संवर्धन कार्यक्रमों में भी है . ( राष्ट्रिय शिक्षा निति  १९८६,  १९९२ , NCF २००५,  RTE २००९ और सरकार करोड़ो रुपए SSA के माध्यम से शिक्षकों की ट्रेनिंग में लगा दिया है इस विज़न को पाने में ) –

बाल केन्द्रित और गतिविधि आधारित शिक्षण ,बच्चो के अनुभव को जगह देना , उनकी प्रश्नों को सुनना व् सक्रीय भागीदारी  , गतिविधि आधारित शिक्षण , खोजने , प्रयोगों द्वारा शिक्षण  एक ऐसे वातावरण में जहाँ डर न हो  और संवेधानिक मूल्यों को बढ़ावा देता हो .

आज भी कुछ अपवादों को छोड़कर चाक एंड टॉक ही हमारे कक्षा कक्ष में ज्यादा दिखाई देता है , अनेकों इन सर्विस ट्रेनिंग्स के बाबजूद .

ये विज़न क्लास रूम तक  क्यूँ नहीं पहुँच पाया ,शायद इस विज़न पर हमारा भरोसा ही नहीं है मतलब हम इससे सहमत ही नहीं हैं .

टीचर्स का वर्ल्ड व्यू जो उनमे समाया हुआ है , जिसे उन्होंने जिया है –उन्हें इस विज़न पर भरोसा करने से रोकता है , चाहे कितने  ट्रेनिंग प्रोग्राम क्यूँ ना चला लें , जब तक इस वर्ड व्यू में बदलाव नहीं आएगा ,ये विज़न सपना ही रहेगा .

और भी कई जटिल मुद्दे हैं जो हमारे शिक्षा तंत्र में बदलाव को रोकते हैं – शिक्षकों का निम्न स्तर , शिक्षको की अभिप्रेरणा का निम्न स्तर , भेदभाव , शारीरिक दंड विधान , आउटडेटिड पाठ्यचर्या  व् दृढ़ परीक्षा के तरीके , जबाबदेही की कमी , शिक्षा में कम इन्वेस्ट.

ये सभी मुद्दे की जड़े हमारी मान्यताओं से जुड़ी हैं – मानव के बारें में , शिक्षा के बारें में और समाज के बारे में . निशिचत तौर पर केवल वर्ल्ड व्यू को बदलने से हमारे शिक्षा तंत्र की सारी  समस्याएँ ख़त्म नहीं हो जाएँगी , पर बिना माइंड सेट में बदलाव के हम कोई असरकारक छाप भी नहीं छोड़ सकते .

शिक्षकों के वर्ल्ड व्यू क्या हैं ?

शोध से ये पता चलता है की शिक्षकों के वर्ल्ड व्यू  संविधान के वर्ल्ड व्यू के एकदम विपरीत हैं ,

समानता पर मान्यता –

“ वास्तव में शिक्षा इनके जीन में ही नहीं है “

भारतीय संविधान सभी लोगों में समानता  को व्यक्त करता है , यहीं से मूल्य   भारत की शिक्षा निति में पहुँचते है….

सभी बच्चे सीखने की क्षमता रखते हैं और ये सभी का अधिकार है ……सभी मूलतः सीखने को अभिप्रेरित हैं ,   (NCF 2005: १४-15 )

इसके विपरीत , इस शोध के कई शिक्षक ये मान्यता रखते हैं की कुछ बच्चे सीखने की क्षमता नहीं रखते हैं  या स्लो लर्नर हैं ,विशेष तौर पर लो कास्ट, गरीब  या लड़कियां .

शिक्षक पूर्वाग्रह को भी रखे हुए हैं  जैसे

“इन बच्चों के परिवार में शिक्षा का कोई बैकग्राउंड नहीं है , ये कुछ नहीं समझते हैं , स्कूल क्यूँ आते है ,मुझे तो ये भी समझ नहीं आता “

इन्हें तो कितना भी पढ़ा लो ,ये नहीं समझेंगे , कितना भी कर लो , इए नहीं सीख सकते .

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ज्ञान पर मान्यता –

“बिना ज्ञान दिए , ये कैसे सीख सकते हैं “  

भारतीय संविधान अंपने नागरिको में सोचने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बढ़ावा देता है और  चाहता है की नागरिक वैज्ञानिक सोच  और खोजने की प्रवति ,सुधार की प्रवति का अनुपालन करें . ( अनु . 51 A(h))

कक्षा के स्तर पर इसके मायने हैं की बच्चे अपने बारे में स्वयं सोचे , सवाल करें , रचनात्मक रूप से नए विचारों का सर्जन करें अपने अनुभवों के आधार पर  ना की केवेल पाठ्य –पुस्तक में दिए गए ज्ञान को पुन: कह दें .

अधिकांशत: शिक्षकों का मानना है की उनकी भूमिका ज्ञान को पास करने , देने की है ताकि ज्ञान बच्चो के दिमाग तक पहुँच जाए . बिना ज्ञान दिए बच्चे कैसे सीखेंगे . अनुभव से किये गए अर्जित ज्ञान को पाठ्य –पुस्तक से अर्जित ज्ञान से  साफ तौर पर कम आँका जाता है . बच्चे कुछ व्यवहारिक ज्ञान अपने जीवन से सिख सकते हैं पर वैज्ञानिक ज्ञान /विज्ञानं तो बिना स्कूल के नहीं सिखा जा सकता . ये विश्वास उनके दैनिक जीवन के अनुभव व् ज्ञान को नकारता है विशेषत: जब वे पिछड़े समाज से आते हैं .

एक अन्य शोध से भी यही पता चलता ही की शिक्षक पाठ्य –पुस्तक में से याद किये हुए तथ्य को ही जानकारी /बुद्धिमता मानते हैं , इस पाठ से हमने क्या सिखा को दोहराना ज्ञान प्राप्त हो जाना है .

ये माइंड सेट भारतीयों को केवल शिक्षा में उपभोक्ता मानता है ना की ज्ञान निर्माण प्रक्रिया में भागिदार , इसकी जड़े निसंदेह ब्रिटिश काल से जड़ी है वरन उससे पहले प्राचीन ब्राह्मण परंपरा से भी जुड़ी हैं .

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उद्देश्य को लेकर मान्यता – “सबसे महत्वपूर्ण है पद , परिवार का रुतबा ऊँचा होना चाहिए”

संविधान के विज़न के अनुरूप – भाईचारा , एकता व् देश की अखंडता  इस ओर इंगित करता है की हमारे काम करने का उद्देश्य  बस अस्तित्व के लिए जीना नहीं है बल्कि सेवा के लिए जीना है .

 शिक्षा का उद्देश्य समाज को अगले पड़ाव पर ले जाने  और समाज को समनाधिकरवादी बनाने से है. ( NCF 2005 :7)

पर अधिकांशत: शिक्षकों के अनुसार शिक्षा व्यक्तिगत सामाजिक –आर्थिक सुधार के लिए है , ये विचार समाज में विद्यमान एक दुसरे से श्रेष्ठ होने की परंपरा का पोषक है .

शिक्षक शिक्षा को केवल कमाने का जरिए मानते हैं ना की सेवा का . शिक्षकों , माता –पिता , समाज –सभी का मानना है की शिक्षक केवल अच्छे अंक लाने में बच्चों की मदद करें , यही सफल जीवन के लिए जरूरी है .

अन्य मान्यताएं –

बच्चो को भय व् अनुसाशन से नियंत्रित किया जा सकता है , लोकतान्त्रिक  और दोस्त जैसा व्यवहार से इसे हासिल नहीं किया जा सकता .

शिक्षक चाहते हैं की सभी बच्चे एक जैसे प्रोग्रेस करें , उनकी विविधता को सकारात्मक नहीं माना जाता .   

बच्चो को सिखने के लिए फेल होने  का भय , परीक्षा के परिणाम की चिंता व् अन्य बाह्य कारक की जरूरत होती है , ये विचार की बच्चे सिखने में आंनंद लेते हैं , और मानव की ये प्रवति उसे सिखने की लिए एक जरूरी अभिप्रेरणा है का विरोध करता है .

सीखना और खेल कूद को अलग देखना भी एक आम धारणा है अधिकतर शिक्षकों के बीच.

शिक्षकों को कार्य पूरा करना की जिम्मेदारी है , ना की आउटकम लाने की – ये उनके प्रोफेशनल कमिटमेंट को कम करता है .

गरीब बच्चो /पिछड़े बच्चों को पढ़ाने से शिक्षको का समाज में स्तर भी कम हो रहा है ,जिसका असर उनके प्रोफेशनल कमिटमेंट पर पड़ता है .  

शिक्षकों के वर्ल्ड व्यू व् प्रैक्टिस का सम्बन्ध

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इस सारिणी से स्पष्ट है की जिन शिक्षकों के बाल केन्द्रित विचार है उन्ही की शिक्षण विधा बाल केन्द्रित है . किसी भी शिक्षक जो LOW LCE रखता है , हाई LCE शिक्षण विधा   (LCE-लर्नर सेंटर्ड एजुकेशन )  को नही दर्शाता है . और जो शिक्षक  हाई lce मान्यताएं रखता है low lce शिक्षण विधा दिखाता हो ऐसा भी देखने को नहीं मिला .

ये शोध ये दिखाता है की केवल ज्ञान ,शिक्षण विधा को जान लेने से शिक्षक अपना काम बेहतर तरीके से नहीकर सकते इसके लिए जरूरी है उनके वर्ल्ड व्यू  पर काम करने की .

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वर्ल्ड व्यू आइसोलेशन में नहीं बनते है , उनकी प्रैक्टिस और तंत्र इनको बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं ,

जो वर्ल्ड व्यू उन्होंने अपने स्कूल  के समय जिया था या जिस समाज में वे रोज जीते हैं –यहीं से उनका वर्ल्ड व्यू बनता है , शिक्षक इसी समाज का छोटा सा घटक है , शिक्षक इस नए वर्ल्ड व्यू को नहीं अपना पाते क्यूंकि इसे उन्होंने जिया ही नहीं है. वे इसी द्वन्द में जीते हैं की उन्हें वो विश्वास एक अलग वर्ल्ड व्यू में करें और जियें एक अलग वर्ल्ड व्यू में.

अम्बेडकर जी ने इसी विरोधाभास को कई दशक पहले हमारे संविधान के लिए कहा था –


“26 जनवरी 1950 को, हम विरोधाभासों के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हमारे पास समानता होगी और सामाजिक और आर्थिक जीवन में हमारे पास असमानता होगी। राजनीति में हम एक आदमी के एक वोट और एक वोट के एक मूल्य के सिद्धांत को पहचानेंगे। हमारे सामाजिक और आर्थिक जीवन में, हम अपनी सामाजिक और आर्थिक संरचना के कारण, एक आदमी एक मूल्य के सिद्धांत को अस्वीकार करना जारी रखेंगे। कब तक हम विरोधाभासों के इस जीवन को जीना जारी रखेंगे? कब तक हम अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता को नकारते रहेंगे?

अंबेडकर जानते थे कि

विश्वदृष्टि “एक प्राकृतिक भावना नहीं है; इसकी खेती करनी होगी

 शायद हमारी नीतियां, पाठ्यक्रम संबंधी रूपरेखा,और शैक्षिक सुधारों ने शिक्षकों के साथ अन्याय किया है, एक अलग विश्वदृष्टि का अभ्यास करने के लिए उनसे अपेक्षा करना,समय और प्रयास को सुविधाजनक बनाने के लिए निवेश किए बिना विश्वदृष्टि बदलाव को चाहना । वर्ल्डव्यू के साथ जुड़ने से हमें शुरुआत करने में मदद मिल सकती है एक प्रमुख अदृश्य बाधा को संबोधित करने के लिए और उसके लिए  जो परिवर्तन हम देखना चाहते हैं  और चिंतन करें की   हमें क्या करना चाहिए हमारे सपने के सच होने के लिए ,अगर हम अपने सपने के  बारे में गंभीर है।

हमें ईमानदारी से अपने –अपने वर्ल्ड व्यू को जानने के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे , और मिलकर सोचना होगा , रास्ते तलाशने होंगे हमारे वर्ल्ड व्यू व् संवेधानिक वर्ल्ड व्यू में फैले रास्ते को पाटने  के लिए , इस लेख पर अपने विचार साझा करके आप शुरुआत कर सकते हैं .

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